बिहार के शिवहर की 20 साल की रेखा कुमारी कान की बीमारी का इलाज कराने पटना के महावीर आरोग्य संस्थान गई थीं। परिवार का आरोप है कि ऑपरेशन के बाद नर्स ने नस की जगह आर्टरी में इंजेक्शन लगा दिया। रेखा ने दर्द और बेचैनी की शिकायत की, लेकिन कहा जाता है कि किसी ने ध्यान नहीं दिया। नतीजा? इन्फेक्शन इतना फैल गया कि उसका हाथ काटना पड़ा। नवंबर में होने वाली शादी भी टूट गई। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि जब वे FIR करने गए तो पुलिस ने मना कर दिया।
ज़रा सोचिए: ऐसे देश में जहां आप इलाज के लिए जाते हैं और हाथ गंवाकर लौटते हैं, वहां सिर्फ़ नारे लगाने से क्या फायदा होगा? सबसे पहले, अस्पतालों में अकाउंटेबिलिटी, डॉक्टरों और नर्सों की ज़िम्मेदारी और पीड़ितों को इंसाफ़ पक्का करें। अगर 100 में से 99 नंबर लाने वाले घर बैठें, और -40 लाने वाले इलाज करें, तो हम सब और क्या उम्मीद कर सकते हैं?
कोई देश नारों से नहीं, बल्कि सिस्टम से महान बनता है।



