केसरिया स्तूप, जहां बुद्ध ने दिया था अपने अनुयायियों को अंतिम उपदेश

पूर्वी चंपारण: केसरिया स्तूप भगवान बुद्ध से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है. बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए ये पवित्र स्थलो में एक और आस्था का केंद्र है. भिक्षु प्रज्ञाद्वीप के अनुसार, इसी स्थान पर भगवान बुद्ध ने वैशाली के लोगों को यादगार भेंट स्वरूप अपना बाल दिया था. केसरिया स्तूप विश्व का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप इसलिए है क्योंकि मानव के शरीर के सबस ऊपरी भाग में अंतिम बाल ही होता है. चूंकि बाल से जुड़ा हुआ इतिहास है इसलिए सबसे ऊंचा स्तूप का यहां निर्माण हुआ था.

 

दुनिया का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप: पूर्वी चंपारण जिले के केसरिया में स्थित यह भव्य बौद्ध स्तूप भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे ऊंचे और विशाल बौद्ध स्तूपों में गिना जाता है. इसकी वर्तमान ऊंचाई लगभग 104 फीट बताई जाती है, जबकि इसकी गोलाकार परिधि करीब 1400 फीट है. माना जाता है कि जब यह अपने मूल स्वरूप में था, तब इसकी ऊंचाई इससे भी अधिक रही होगी. इसकी विशालता और स्थापत्य कला इसे विश्व के प्रमुख बौद्ध स्मारकों में विशेष स्थान दिलाती है.

 

बुद्ध की अंतिम यात्रा से जुड़ी है मान्यता: बौद्ध ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, भगवान बुद्ध वैशाली से कुशीनगर की अपनी अंतिम यात्रा (महापरिनिर्वाण से पहले) शुरू की थी. इस दौरान वे केसरिया में कुछ समय के लिए रुके थे. उनके अनुयायी उनसे अलग नहीं होना चाहते थे और लगातार उनके साथ चल रहे थे. तब बुद्ध ने यहीं रुककर स्थानीय लिच्छवी शासकों और अपने शिष्यों को धर्म का उपदेश (धम्मदेशना) दिया और उन्हें वापस लौटने के लिए प्रेरित किया.

किंवदंती के अनुसार, इसी स्थान पर भगवान बुद्ध ने अपना भिक्षापात्र अपने अनुयायियों को सौंपा था और विदा लिया था. तब से यही स्थान ‘भिक्षापात्र दान स्थल’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ. इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में बाद में यहां एक स्मारक के रूप में स्तूप का निर्माण कराया गया.

“कहां जाता है कि भगवान बुद्ध के अनुयायियों ने उनकी याद में यह विशाल स्तूप बनवाया, जो कालांतर में कई बार पुनर्निर्मित हुआ. यह बहुत ही रमणीक स्थान है. यहां आकर बहुत अच्छा लग रहा है. यहां दूर-दूर से लोग आते हैं.”- रमेश तिवारी, पर्यटक

विदाई पॉइंट है केसरिया स्तूप: भिक्षु प्रज्ञाद्वीप कहते हैं कि उस समय वहां मौजूद लोगों के लिए बड़ा सौभाग्यशाली था. वो बड़े प्रसन्न हुए थे. तभी सभी ने भगवान बुद्ध के केश “बाल” भिक्षा पात्र में लेकर आदरपूर्वक विदाई की थी. एक तरह से कहा जाए तो केसरिया स्तूप भगवान बुद्ध के विदाई का पॉइंट है.

भगवान बुद्ध से जुड़ा हुआ सबसे ऊंचा स्तूप विश्वभर में अगर कहीं है तो वह केसरिया स्तूप ही है. बीच में इस स्तूप की स्थिति ठीक नहीं थी, लेकिन अब बिहार सरकार इसकी पुरानी पहचान लौटाने में लगी है. वहां पर स्थिति सुधारी गई है. यह गौरव वैशाली के लोगों से जुड़ा हुआ है. इसके इतिहास सीधे तौर पर भगवान बुद्ध के बाल से जुड़े हैं. यहां पर अब बड़ी संख्या में भगवान बुद्ध के अनुयायी और पर्यटक पहुंचते हैं. आज भी इसकी भव्यता देश दुनिया में आस्था का केंद्र है.”- भिक्षु प्रायद्वीप, महामंत्री, अखिल भारतीय भिक्षु संघ

अशोक से लेकर पाल शासकों तक का योगदान: इतिहासकारों के अनुसार, इस स्तूप की मूल संरचना का निर्माण मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में कराया गया था. बाद में गुप्त और पाल शासकों ने इसका कई चरणों में विस्तार और सौंदर्यीकरण कराया. समय के साथ यह स्तूप मिट्टी में दब गया और सदियों तक लोगों की नजरों से ओझल रहा, लेकिन इसकी ऐतिहासिक पहचान कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई.

खुदाई में सामने आया इतिहास: इस ऐतिहासिक स्थल की पहचान सबसे पहले वर्ष 1814 में हुई. इसके बाद वर्ष 1861-62 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद जनरल अलेक्जेंडर कनिंघम ने यहां सर्वेक्षण और प्रारंभिक खुदाई कराई. हालांकि व्यापक स्तर पर खुदाई का कार्य वर्ष 1998 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पुरातत्वविद के.के. मुहम्मद के नेतृत्व में हुआ. इस खुदाई के बाद दुनिया के सामने इस विशाल बौद्ध स्तूप का वास्तविक स्वरूप आया.

“केसरिया स्तूप का बाद में राजा सम्राट अशोक ने निर्माण कराया था. इतिहासकारों के अनुसार, भगवान बुद्ध कपिल वस्तु से निकले तब अपने साथ वो कंठक घोड़ा और तलवार लेकर चले थे. जब केसरिया में पहुंचे थे तब उन्होंने अपनी तलवार से अपना मुंडन किया था. वो उनके बालों से जुड़ा हुआ स्थान है. बाद में सम्राट अशोक ने विश्व के सबसे ऊंचे स्तूप का निर्माण कराया था. बाद में इस स्तूप को भी खंडित किया गया था, लेकिन आज भी विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप केसरिया स्तूप ही है.”- भिक्षु बुद्धदेव भंते, बिहार प्रदेश भिक्षु संघ के कैशियर

खुदाई में मिले कई ऐतिहासिक अवशेष: पुरातत्व विभाग की खुदाई के दौरान यहां से भगवान बुद्ध की कई प्रतिमाएं, मौर्यकालीन ईंटें, तांबे की वस्तुएं, इस्लामिक काल के सिक्के, प्रदक्षिणा पथ, बहुमंजिला संरचना के अवशेष तथा अन्य कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक सामग्री मिली. इन खोजों ने यह प्रमाणित किया कि यह स्थल विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों में लगातार विकसित होता रहा और बौद्ध संस्कृति का प्रमुख केंद्र रहा.

“यह स्थान भगवान बुद्ध की तपस्या और उपदेशों की याद दिलाता है. देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु यहां पहुंचकर शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं. सरकार को इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण और पर्यटन विकास पर और अधिक ध्यान देना चाहिए.”- रामेश्वर भगत,स्थानीय निवासी

“केसरिया स्तूप पूर्वी चंपारण की पहचान है. यदि यहां बेहतर सड़क, पर्यटन सुविधाएं और प्रचार-प्रसार किया जाए तो यह स्थान अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर और भी प्रमुखता से उभर सकता है. इस धरोहर को देखने हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं और स्थानीय लोगों को इससे रोजगार के नए अवसर भी मिल सकते हैं.”- योगी राज,स्थानीय निवासी

केसरिया स्तूप पूर्वी चंपारण की महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर’: पंडित उगम पाण्डेय कॉलेज के हिस्ट्री प्रोफेसर प्रेमजीत कुमार का कहना है कि केसरिया स्तूप पूर्वी चंपारण की महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर है. यहां मौजूद अवशेष प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म के प्रभाव और स्थापत्य परंपरा को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. उनका कहना है कि इस विरासत का संरक्षण और वैज्ञानिक तरीके से प्रचार-प्रसार बेहद जरूरी है. बुद्ध की मृत्यु की घटना को बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा जाता है.

“महात्मा बुद्ध महापरिनिर्वाण से पहले केसरिया स्तूप आए थे और उन्होंने यहां अपना अंतिम उपदेश से पहले उपदेश दिया था और अपने शिष्य को अवशेष के रूप में भिक्षादान किया था. जैसा की हम जानते हैं कि महात्मा बुद्ध से जुड़े किसी भी चीजों का चाहे उनका खड़ाऊ हो या दंत अवशेष, उन अवशेषों पर ही स्तूप निर्माण की प्रणाली विकसित की गई है. हर एक स्तूप कुछ न कुछ चीजों का बना हुआ है. महात्मा बुद्ध ने अपना जो भिक्षापात्र पर इस स्तूप का निर्माण हुआ था.”- प्रेमजीत कुमार,पंडित उगम पाण्डेय कॉलेज के हिस्ट्री प्रोफेसर

विद्यार्थियों के लिए है अहम: हाई स्कूल मच्छहा के प्रधानाध्यापक राकेश कुमार आर्य के मुताबिक, “केसरिया स्तूप विद्यार्थियों के लिए इतिहास को करीब से समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है. किताबों में पढ़े जाने वाले मौर्य, गुप्त और बौद्ध काल के इतिहास को यहां की संरचनाओं और पुरातात्विक अवशेषों के माध्यम से बेहतर तरीके से समझा जा सकता है.”

नई पीढ़ी महसूस करती है जुड़ाव: पंडित उगम पाण्डेय की होम साइंस प्रोफेसर मनीषा आर्य का कहना है कि बुद्ध का संदेश केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसमें शांति, करुणा, मानवता और सरल जीवन का संदेश भी छिपा है. केसरिया जैसे ऐतिहासिक स्थल नई पीढ़ी को इन मूल्यों से जोड़ने का काम करते हैं.

“हमलोग बौद्ध स्तूप देखने आए हैं. यह दुनिया का सबसे बड़ा स्तूप है. महात्मा बुद्ध यहां ठहरे थे.”- आदित्य कुमार सावन, पर्यटक

पहले शिव मंदिर माना जाता था यह स्थल: दिलचस्प बात यह है कि खुदाई से पहले स्थानीय लोग इस स्थान को एक प्राचीन शिव मंदिर मानते थे. लेकिन जब खुदाई में भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं, बौद्ध अवशेष और विशिष्ट स्थापत्य शैली सामने आई, तब पुरातत्व विभाग ने इसे बौद्ध स्तूप के रूप में प्रमाणित किया. इसके बाद इस स्थल की पहचान विश्वस्तर पर और अधिक मजबूत हुई.

‘देवला’ के नाम से भी प्रसिद्ध: केसरिया और आसपास के ग्रामीण आज भी इस ऐतिहासिक स्थल को “देवला” यानी “भगवान का घर” कहकर पुकारते हैं. स्थानीय लोगों के लिए यह केवल एक पुरातात्विक धरोहर नहीं, बल्कि गहरी आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है

केसरिया स्तूप का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व:-

यहां हर साल बौद्ध पूर्णिमा और धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस पर हजारों श्रद्धालु जुटते हैं.

यहां सूर्योदय और सूर्यास्त के समय अद्भुत नजारा दिखाती हैं. माना जाता है कि यहां ध्यान करने से मन की शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है.

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस स्तूप को राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित किया है.

कहां है केसरिया स्तूप? : बिहार के पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) जिले के केसरिया नगर में केसरिया स्तूप स्थित है. राजधानी टना से करीब 110 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम और वैशाली जिले से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित है. केसरिया स्तूप भारत ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के सबसे ऊंचे बौद्ध स्तूपों में से माना जाता एक है. इस स्तूप की ऊंचाई लगभग 104 फीट (32 मीटर) है, जो नेपाल के लुंबिनी और उत्तर प्रदेश के सारनाथ

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