थावे वाली माता (थावे भवानी) का प्रसिद्ध शक्तिपीठ मंदिर बिहार के गोपालगंज जिले के थावे में स्थित है। यह धाम माँ दुर्गा के रूपों में से एक, माँ कामाख्या का ही पवित्र स्थान माना जाता है।

थावे माता और भक्त रहसु की कथा
थावे मंदिर की स्थापना से जुड़ी पौराणिक एवं लोककथा अत्यंत रोचक है:
भीषण अकाल और भक्त रहसु: प्राचीन काल में इस क्षेत्र में चेरो वंश के घमंडी राजा मनन सिंह का शासन था। एक बार राज्य में भीषण अकाल पड़ा, जिससे लोग दाने-दाने को तरसने लगे। थावे के जंगलों में माँ दुर्गा का एक परम भक्त रहता था जिसका नाम रहसु भगत था। रहसु भगत माँ की कृपा से घास/पटेर को बाघ की मदद से दौनी करते थे और उससे चावल निकलने लगता था, जिसे वे अकाल पीड़ितों में बाँटते थे।
राजा का अहंकार: जब राजा मनन सिंह को यह बात पता चली, तो उसने रहसु भगत को ढोंगी समझा। राजा ने हठ किया कि रहसु अपनी भक्ति के बल पर देवी माँ को प्रत्यक्ष दरबार में बुलाए। रहसु ने राजा को चेतावनी दी कि माँ भवानी के आने से विनाश हो जाएगा, लेकिन राजा नहीं माना।
माँ भवानी का आगमन: भक्त रहसु के करुण आह्वान पर माँ कामाख्या असम से चलकर पटना (पाटन देवी) और सारण (आमी) होते हुए थावे पहुँचीं। माँ के आते ही भयंकर आंधी-तूफान आया और बिजली कड़की।
राजा का अंत और मंदिर स्थापना: माँ भवानी ने प्रकट होकर जैसे ही रहसु भगत का मस्तक फाड़कर अपना हाथ और कंगन दिखाया, राजा मनन सिंह का पूरा राजपाठ और महल ध्वस्त हो गए और राजा की मृत्यु हो गई। इसके बाद माँ उसी स्थान पर स्थापित हो गईं।
मंदिर से जुड़ी मुख्य परंपराएं व तथ्य
भक्त रहसु का मंदिर: थावे मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर भक्त रहसु का भी मंदिर है। मान्यता है कि थावे माता के दर्शन के बाद जब तक भक्त रहसु की पूजा न की जाए, तब तक दर्शन पूरे नहीं माने जाते।
प्रसिद्ध प्रसाद: यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के बीच मीठी पिड़किया (गुझिया जैसी मिठाई) का प्रसाद अत्यंत लोकप्रिय है।
विशेष अवसर: चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहाँ देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।



